Tuesday, 16 July 2019

मीडिया और हम

मीडिया परोसता है जिसकी मांग होती है. मीडिया वह भी परोसता है जो सुरुचिपूर्ण और उचित है. भले ही उसकी मांग नगण्य हो. हम अपनी रुचियों और प्रवृत्तियों को भी परखें.

मीडिया हमें गढ़ता है. हम भी मीडिया को गढ़ते हैं.

मीडिया पक्ष लेती है. हमें पता कैसे चलता है?

हम भी पक्ष लेते हैं. हम इसको नहीं स्वीकार करते हैं.

अपनी बुद्धि गिरवी रखने के लिए कोई हमें नहीं कहता.

मीडिया वास्तव में हमारी प्रतिकृति है, अन्य किसी भी अभिकरण से अधिक.

नीरज कुमार झा

Friday, 27 July 2018

तुम कहो

तुम कहो

इसलिए नहीं कि
कोई सुनेगा.
तुम कहो इसलिए
कि कहना जरूरी है.
मुझे लगता है
कही गुम नहीं होती.
कही, तैरती हवाओं में
घुलती है सांसों में.

नीरज कुमार झा

Tuesday, 17 April 2018

नागफनी

जहर बुझे काँटों का 
नागफनी खड़ा था, 
चटखते मरू में. 
बिना पानी की 
जमीन से,
सच उगेगा भी 
और कैसे?

नीरज कुमार झा

Sunday, 25 February 2018

कहीं नहीं से आना

अनादि ही आदि का उद्गम है,
अनन्त ही अंत का तल है,
अज्ञेय ही ज्ञेय का आधार है,
अर्थहीनता ही अर्थ की भूमि है.

नीरज कुमार झा

Friday, 23 February 2018

मैं क्या चाहता हूँ?

मैं चाहता हूँ कि
सवालों के जवाब दिए जाएँ,
और जवाबों पर सवाल किए जाएँ.
ये खुद के हों और या किसी और के,
और के हों तो किसके,
को लेकर कभी फ़र्क नहीं किया जाए.
मैं और कुछ नहीं,
सिर्फ़ गुलामी की काट चाहता हूँ.

नीरज कुमार झा

Sunday, 31 December 2017

दर्शन, दर्शनहीनता, और प्रतिदार्शनिकता

समय दर्शन - अध्ययन, अवलोकन, संवेदना और बुद्धि से युक्त दर्शन - की सक्रियता की मांग करता है. दर्शन को दर्शन और दर्शनहीनता अथवा दर्शन और प्रतिदार्शनिकता में भी अंतर स्पष्ट करना होगा क्योंकि इनमें स्वरूप का अंतर नहीं है. दर्शन को यह भी बताना होगा कि दर्शन का उद्देश्य दर्शन का प्राधिकारवाद नहीं है, बल्कि मानवीयता के प्रवाह को अबाध रखना है. दर्शन का एक महती उद्द्देश्य आसुरी तत्त्वों के प्रतिकार के लिए लोगों को  संगठित रखना भी है. एक समय दर्शन को हम इतनी ऊँचाई तक ले गए कि सारी की सारी जमीन ही खो बैठे. 

नीरज कुमार झा

Tuesday, 19 December 2017

क्या ऐसा भी है?

क्या ऐसा भी है कि समाधान या विश्लेषण हेतु भी समस्याएँ निर्मित की जा रही हों? पता नहीं, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि प्रत्येक व्यक्ति पहले अपने आचरण से समस्या का कारण या निदान होता है. ऐसा भी हो सकता है कि समाधान और विश्लेषण करने वाले ही समस्याओं के निरंतरता के कारक हों. महात्मा गांधी शायद इसलिए वचन और आचरण में ऐक्य की बात करते थे.


नीरज कुमार झा