Friday, 27 July 2018

तुम कहो

तुम कहो

इसलिए नहीं कि
कोई सुनेगा.
तुम कहो इसलिए
कि कहना जरूरी है.
मुझे लगता है
कही गुम नहीं होती.
कही, तैरती हवाओं में
घुलती है सांसों में.

नीरज कुमार झा

Tuesday, 17 April 2018

नागफनी

जहर बुझे काँटों का 
नागफनी खड़ा था, 
चटखते मरू में. 
बिना पानी की 
जमीन से,
सच उगेगा भी 
और कैसे?

नीरज कुमार झा

Sunday, 25 February 2018

कहीं नहीं से आना

अनादि ही आदि का उद्गम है,
अनन्त ही अंत का तल है,
अज्ञेय ही ज्ञेय का आधार है,
अर्थहीनता ही अर्थ की भूमि है.

नीरज कुमार झा

Friday, 23 February 2018

मैं क्या चाहता हूँ?

मैं चाहता हूँ कि
सवालों के जवाब दिए जाएँ,
और जवाबों पर सवाल किए जाएँ.
ये खुद के हों और या किसी और के,
और के हों तो किसके,
को लेकर कभी फ़र्क नहीं किया जाए.
मैं और कुछ नहीं,
सिर्फ़ गुलामी की काट चाहता हूँ.

नीरज कुमार झा